
भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहाँ विभिन्न समुदायों के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ (Personal Law) मौजूद हैं। यहाँ हिन्दुओं के लिए हिन्दू विधि है तो मुसलमानों के लिए मुस्लिम विधि। हिन्दू विधि न केवल भारत में सबसे प्राचीन विधि प्रणाली है, बल्कि यह विश्व की सबसे पुरानी विधि प्रणालियों में से एक है।
आम तौर पर लोग यह मानते हैं कि हिन्दू कानून की उत्पत्ति दैवीय है और इसके स्रोत वेदों से जुड़े हैं। हालांकि आधुनिक हिन्दू कानून न्यायिक व्याख्याओं (Judicial Interpretation) और संसदीय कानूनों (Legislations) से होकर गुजर चुका है, इसलिए अब इसके दैवीय होने के दावे को साबित करना मुश्किल है। फिर भी, कुछ मामलों में आज भी रीति-रिवाजों को इजाजत दी गई है।
हिन्दू कानून के स्रोतों को समझने से पहले सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि हिन्दू कौन है?
हिन्दू कौन है? Hindu Kaun Hai – Hindu Vivah Adhiniyam 1955 ke Anusar
हिन्दू शब्द की गहराई से पड़ताल करने पर पता चलता है कि इस शब्द का अर्थ प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक बहुत बदल गया है। हिन्दू शब्द की उत्पत्ति 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास हुई। फारसी लोगों द्वारा सिंधु दरिया के पार रहने वाले लोगों को दर्शाने के लिए इस शब्द का प्रयोग किया गया था। उस समय भारत वेदों के अनुयायियों द्वारा बसा हुआ था, इसलिए यह शब्द भारत में रहने वाले और वेदों तथा हिन्दू धर्म का पालन करने वाले लोगों के एक निश्चित समूह के लिए कहा जाने लगा।
जैसे-जैसे समय बीता, भारत की धरती पर अलग-अलग धर्मों का उदय शुरू हुआ, जिसके परिणामस्वरूप भारत में कई नए धर्म और नस्लों के लोग मौजूद हुए। वर्तमान समय में बहुत सारे मान्यता प्राप्त धर्म हैं जो “हिन्दू कौन है” को परिभाषित करना मुश्किल बनाते हैं। इस मुश्किल को दूर करने के लिए हिन्दू विवाह कानून, 1955 में हिन्दू शब्द को व्यापक रूप में परिभाषित किया गया है:
1. धर्म के आधार पर: वह सभी व्यक्ति जो धर्म द्वारा हिन्दू, सिख, जैन और बौद्ध हैं। इस श्रेणी में हिन्दू, सिख, जैन या बौद्ध धर्म में धर्म परिवर्तन करने वाले और पुनः परिवर्तन करने वाले भी शामिल हैं।
2. जन्म के आधार पर: वह सारे व्यक्ति जो हिन्दू, सिख, जैन या बौद्ध माता-पिता से पैदा हुए हैं। अगर सिर्फ एक माता या पिता हिन्दू है तो उसे भी हिन्दू के रूप में पाला जाना चाहिए। इस श्रेणी में जायज और नाजायज दोनों बच्चे शामिल हैं।
3. अवशिष्ट धारा के आधार पर: वह सारे व्यक्ति जो मुसलमान, ईसाई, पारसी या यहूदी नहीं हैं, जो भारत में बसे हुए हैं और उन्हें कोई और कानून लागू नहीं होता। यह धारा एक किस्म की बची हुई धारा है।
इस परिभाषा से यह स्पष्ट हो जाता है कि विधान सभा ने एक बहुत व्यापक परिभाषा तैयार की है जिसमें तकनीकी तौर पर दूसरे धर्मों के लोग भी शामिल हैं। अगर कोई व्यक्ति जन्म या धर्म परिवर्तन द्वारा हिन्दू है तो यह काफी होगा, भले ही वह असल में नास्तिक, गैर-धार्मिक या अपने विश्वास को नकारता ही क्यों न हो। जब तक वह अपना विश्वास नहीं छोड़ता और नया धर्म नहीं अपनाता, वह उस धर्म का सदस्य बना रहता है।
हिन्दू कानून का स्रोत किसी भी हालत में किसी विशेष किताब या व्यक्ति के घेरे में नहीं आ सकता। हिन्दू कानून विशाल है। इसके स्रोतों को दो मुख्य भागों में बांटा जा सकता है।
A) प्राचीन स्रोत (Ancient / Traditional Sources)
B) आधुनिक स्रोत (Modern Sources)
A) हिन्दू कानून के प्राचीन स्रोत (Traditional Sources of Hindu Law)
प्राचीन स्रोत उन प्राचीन हिन्दू कानूनी प्रणालियों का हवाला देते हैं जो उस खास समय में हिन्दुओं के आचरण को नियंत्रित करते थे। हिन्दू कानून का परंपरागत स्रोत कुछ सिद्धांतों के साथ मौजूद प्रणाली में मार्गदर्शक सिद्धांत भी है।
1. श्रुति – वेद (Shruti – Vedas)
श्रुति का शाब्दिक अर्थ है “जो सुनी गई हो”। यह शब्द “श्रु” धातु से लिया गया है जिसका अर्थ है सुनना। सैद्धांतिक तौर पर इसे हिन्दू कानून का सर्वोच्च स्रोत माना जाता है और यह ऋषियों द्वारा देवताओं की भाषा मानी जाती है। यह माना जाता है कि ऋषि आध्यात्मिकता की ऐसी ऊंचाई पर पहुंच गए थे कि उन्हें किसी ब्रह्म आदेश द्वारा वेदों के बारे में सूचित किया गया था।
श्रुतियों में चार वेद शामिल हैं – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ब्राह्मणों को वेदों का मार्गदर्शक माना जाता है। कुछ लोग मानते हैं कि वेदों में कानून और आचार संहिता है, जबकि दूसरे मानते हैं कि कानूनों को वेदों से ही लिया जाना चाहिए।
यह नोट किया जा सकता है कि चार वेद हैं और हरेक वेद के तीन भाग हैं:
1. संहिता (भजन होते हैं)
2. ब्राह्मण (जो कर्तव्य और उन्हें निभाने के साधन बताते हैं)
3. उपनिषद (फर्जों का सार)
वेद अधिकार और कर्तव्य, विवाह के रूप, पुत्र की लोड, बंटवारा और विरासत से औरतों को अलग करने की व्यवस्था करते हैं, पर इन्हें स्पष्ट कानून नहीं माना जा सकता। समाज को वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) में बांटा गया था और जीवन को अलग-अलग आश्रमों (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास) में बांटा गया था। इस समय दौरान कर्म का संकल्प भी विकसित हुआ था। यह विश्वास किया जाता था कि व्यक्ति को उसके कर्म द्वारा फल मिलेगा। मोक्ष का संकल्प भी प्रचलित था। वैदिक काल 4000 से 1000 ईसा पूर्व माना जाता है।
2. स्मृतियाँ (Smritis)
स्मृति शब्द “स्मृति” से बना है जिसका अर्थ है याद करना। तकनीकी तौर पर स्मृतियों का अर्थ है वह रचनाएं जो ऋषि मुनियों की याद के गुण द्वारा रची गई हैं। स्मृतियों का आधार श्रुतियां ही हैं। स्मृतियों को श्रुतियों से आगे एक कदम कहा जा सकता है।
स्मृतियाँ मुख्यतः दो प्रकार की हैं – धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र। दोनों में अंतर की एक बहुत ही पतली रेखा है। मूल अंतर इस तथ्य में है कि धर्मसूत्र गद्य के रूप में लिखे जाते हैं, जबकि धर्मशास्त्रों को श्लोकों के रूप में लिखा जाता है। बहुत सारे स्मृति लेखक हैं और यह निर्धारित करना असंभव है कि स्मृतियों के कितने लेखक हैं। हालांकि याज्ञवल्क्य द्वारा गिनी गई कुछ प्रसिद्ध स्मृति लेखक हैं जैसे मनु, अत्री, विष्णु, हरीता, यम, कात्यायन, बृहस्पति, पराशर, व्यास आदि।
स्मृतियों द्वारा निर्धारित नियमों को तीन श्रेणियों में रखा जा सकता है:
1. आचार (आचार और नैतिकता से संबंधित)
2. व्यवहार (अधारत नियम जिन्हें राजा को पालना करना चाहिए)
3. प्रायश्चित (गलत के कमीशन के लिए दंड का प्रबंध)
मनुस्मृति सब से पुरानी और सब से महत्वपूर्ण है। यह भारत में नहीं बल्कि कई और देशों जैसे जावा, सुमात्रा, बाली आदि में भी एक आचार संहिता को परिभाषित करती है। मनुस्मृति के लेखक का नाम अज्ञात है क्योंकि लेखक ने इसे मनु के एक काल्पनिक नाम के तहत तैयार किया है जो पहला मनुष्य माना जाता है। यह दैवीय और अधिकारिक रुतबा हासिल करने के लिए किया गया हो सकता है। मनुस्मृति प्रार्थनाओं और गाथाओं का संकलन है। मनु एक ब्राह्मण नायक था और औरतों और शूद्रों के प्रति कठोर था। वह रीति रिवाजों को सब से महत्वपूर्ण मानता है और राजा को रीति रिवाजों की पालना करने के लिए कहता है।
3. टीकाएँ और भाष्य / डाइजेस्ट और कमेंट्री (Digests and Commentaries)
7वीं सदी से 1800 ईस्वी तक स्मृतियों के बाद टीकाओं और भाष्यों की रचना का काल है। क्योंकि ये टीकाएँ और भाष्य स्मृतियों की व्याख्या हैं और इसीलिए मतभेद होना लाजमी है। इसी कारण हिन्दू कानून के अलग-अलग स्कूल पैदा हुए। यह 200 ईस्वी के बाद ही बहुत काम स्मृतियों में मौजूद सामग्री से ही किया जाता था। किसी विशेष स्मृति की व्याख्या करने के लिए किए गए कारज को टीका कहा जाता है। 200 ईस्वी से तुरंत बाद के समय में टीकाओं की रचना की गई थी। डाइजेस्ट मुख्य तौर से उसके बाद लिखे गए थे और सभी स्मृतियों में से सामग्री शामिल करके व्याख्या की गई थी।
कुछ प्रमुख टीकाओं में मनुभाष्य, मनुटीका और मिताक्षरा शामिल हैं। सब से महत्वपूर्ण डाइजेस्ट में से एक है जीमूतवाहन का दायभाग जो उड़ीसा और बंगाल में लागू होता है। मिताक्षरा भारत में कानून का एक जाना-पहचाना और सर्वोच्च स्रोत है। यह याज्ञवल्क्य संहिता पर विज्ञानेश्वर द्वारा लिखी गई टीका पर आधारित है, जबकि दायभाग स्कूल जीमूतवाहन की टीकाओं पर आधारित है। दायभाग और मिताक्षरा भारत में हिन्दू कानून के दो मुख्य स्रोत हैं। इन ग्रंथों का मुख्य उद्देश्य स्मृति और श्रुति के रूप में उपलब्ध बिखरी हुई सामग्री को इकट्ठा करना है और समाज की बेहतरी के लिए इसे व्यापक रूप में संकलित करना है।
4. रिवाज और प्रथाएँ (Customs and Usages)
रिवाज को उन स्थापित प्रथाओं के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो एक समाज या लोगों के समूह द्वारा काफी समय के लिए अपनाए जाते हैं, जो अब उस विशेष समाज या भाईचारे में एक शासन नियम बन गए हैं। इसका अर्थ है कि वह स्थापित प्रथाओं का काफी समय से पालन किया जा रहा है। रिवाज भी कानून का प्रमुख स्रोत है और इसकी स्थिति श्रुतियों और स्मृतियों से भी ऊपर है। यह लिखित कानून से उत्तम है। ज्यादातर हिन्दू कानून रीति रिवाजों पर आधारित है और इसे स्मृतियों में भी कानून के स्रोत के रूप में मान्यता प्राप्त है।
रिवाज को चार किस्मों में बांटा जा सकता है:
1. स्थानिक रीति-रिवाज: यह रीति-रिवाज किसी खास भौगोलिक क्षेत्र में अपनाए जाते हैं और केवल उस खास क्षेत्र तक ही सीमित होते हैं। उदाहरण के तौर पर राजस्थान में बाल विवाह का रिवाज प्रचलित था।
2. जाती और भाईचारक रीति-रिवाज: यह रीति-रिवाज लोगों के एक निश्चित समाज में प्रचलित होते हैं और उस विशेष समाज के लोग इस रिवाज का पालन करते हैं। उदाहरण के लिए सिखों में विवाह आनंद कारज द्वारा किया जाता है।
3. परिवारक रीति-रिवाज: यह किसी खास परिवार में मौजूद रीति-रिवाजों को दर्शाता है। इन्हें रीति रिवाजों के अन्य रूपों के मुकाबले आसानी से छोड़ा जा सकता है।
4. गिल्ड रीति-रिवाज: इन रिवाजों का व्यापारियों के एक समूह द्वारा पालन किया जाता है।
रिवाज और प्रथा शब्द अक्सर एक दूसरे के बदले में प्रयोग किए जाते हैं पर दोनों में कुछ अंतर है। प्रथा क्रियाओं का दोहराव है जबकि रिवाज एक कानून या आम नियम है जो ऐसे दोहराव से पैदा होता है। एक प्रथा रिवाज से पहले हो सकती है पर प्रथा के बिना कस्टम कभी भी मौजूद नहीं हो सकता। प्रथा का अधिकार पिरामिड से लेन-देन के लिए प्राप्त होता है पर रिवाज जिथे मौजूद होता है वहां बंधित है। एक वैध रिवाज के लिए क्या जरूरी है – वह प्राचीन, निश्चित, उचित और निरंतर होनी चाहिए।
B) हिन्दू कानून के आधुनिक स्रोत (Modern Sources of Hindu Law)
हिन्दू कानून के आधुनिक स्रोत उन स्रोतों को दर्शाते हैं जो तुलनात्मक रूप से नए स्रोत हैं जो समय के साथ उभर कर मौजूदा रूप में विकसित हुए हैं।
1. साम्य, न्याय और शुद्ध अंतःकरण (Equity, Justice and Good Conscience)
इक्विटी का अर्थ है निष्पक्ष होना और न्याय में निष्पक्षता का भाव है। निष्पक्षता आधुनिक न्याय प्रणालियों का मुख्य गुण है। सच्चा न्याय बराबरी और अच्छी जमीर द्वारा दिया जा सकता है। जिथे कोई नियम नहीं दिया जाता, उथे यह प्रबल होगा। कई बार ऐसा होता है जब कोई समस्या हल के लिए अदालत के सामने आती है और इसे प्रचलित कानूनों द्वारा नहीं निपटाया जा सकता। ऐसी स्थिति दुर्लभ हो सकती है। ऐसी स्थिति में अदालतें कोई उपाय प्रदान करने से इनकार नहीं कर सकतीं और ऐसे केस का फैसला करना भी उनकी जिम्मेदारी होती है। ऐसे मामलों में अदालतें तर्कशीलता, बुनियादी कदरों-कीमतों और निष्पक्षता के सिद्धांत द्वारा निर्देशित होती हैं। इसीलिए इस सिद्धांत को बराबरी, न्याय और अच्छी जमीर के रूप में जाना जाता है और इसे कुदरती कानून भी कहा जाता है। कुदरती नियम का यह सिद्धांत भारत में अंग्रेजों के समय से ही प्रचलित था।
2. विधान या कानून (Legislation)
हिन्दू कानून का सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली आधुनिक स्रोत कानून है। इसका स्रोत भारत में अंग्रेजी राज स्थापित करने के बाद पैदा हुआ है जब अंग्रेज शासकों ने कई कानून बनाने शुरू किए। कानून, राज समय और हालातों के अनुसार लागू किए गए और इस में संशोधन भी किया गया था। आज हिन्दू कानून के बहुत बड़े हिस्से को संहिताबद्ध किया गया है। विधान संसद का एक एक्ट है जो हिन्दू कानून के इतिहास में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।
स्वतंत्रता के बाद, निजी कानूनों की संहिता बंदी संबंधी कानूनों में भारी वृद्धि हुई है। संहिताबद्ध होने के बाद संहिता कानून द्वारा निर्धारित कोई भी बिंदु अंतिम होता है। विधान सारे कानूनों में संशोधन करता है चाहे वह रिवाज पर आधारित हो या किसी और तरह पर आधारित हो। आधुनिक समाज में नए कानून लाने का यही तरीका है। संसद समाज की लोडों के अनुसार नए कानून बनाती है। उदाहरण के लिए तमिलनाडु में सेल्फ रेस्पेक्ट मैरिज हिन्दू विवाह करने का एक नया तरीका है जो रीति रिवाजों और कानूनों का मिश्रण है।
प्रमुख हिन्दू अधिनियम: हिन्दू विवाह अधिनियम 1955, हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956, हिन्दू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम 1956, हिन्दू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम 1956।
3. पूर्व निर्णय या नजीर (Precedents / Judicial Decisions)
हिन्दू कानून का यह भी एक महत्वपूर्ण आधुनिक स्रोत है। अंग्रेजी राज की स्थापना के बाद अदालतों की एक व्यवस्थित प्रणाली अस्तित्व में आई। न्यायाधीशों ने जब एक ही प्रकार के मामलों में निर्णय दिए तो एक मिसाल कायम हो गई। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 141 के अनुसार सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून भारत की सभी अदालतों पर बाध्यकारी है। इसी तरह हाई कोर्ट का निर्णय उस राज्य की सभी अधीनस्थ अदालतों पर बाध्यकारी होता है।
न्यायिक निर्णयों ने हिन्दू कानून को एक नया रूप दिया है। कई पुराने रिवाज जो आज के समाज के अनुकूल नहीं थे, उन्हें अदालतों ने अमान्य घोषित कर दिया, जैसे बाल विवाह और सती प्रथा।
निष्कर्ष:
इस प्रकार हम देखते हैं कि हिन्दू कानून का विकास एक निरंतर प्रक्रिया है। इसका आधार श्रुति और स्मृति जैसे प्राचीन ग्रंथ हैं, जिन्हें मिताक्षरा और दायभाग जैसे भाष्यों ने समझाया, और जिसे रीति-रिवाजों ने जीवित रखा। वहीं दूसरी ओर, साम्य और न्याय के सिद्धांत, आधुनिक विधान और सुप्रीम कोर्ट तथा हाई कोर्ट के फैसलों ने इसे आज के समय के अनुसार व्यावहारिक और न्यायसंगत बनाया है। एक लॉ के विद्यार्थी के लिए इन सभी स्रोतों को समझना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि अदालत में कोई भी दलील इन्हीं स्रोतों के आधार पर दी जाती है।


