
लिव-इन रिलेशनशिप (Live-in Relationship) भारत में लंबे समय से सामाजिक और कानूनी चर्चा का विषय रहा है। भारत में दो वयस्कों का सहमति से विवाह किए बिना साथ रहना अपने आप में अपराध नहीं माना जाता। हालांकि, हर लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी रूप से विवाह के समान नहीं माना जाता। कुछ परिस्थितियों में ऐसा संबंध “विवाह की प्रकृति वाला संबंध” (Relationship in the Nature of Marriage) माना जा सकता है और कानून के तहत महिला को कुछ सुरक्षा और राहत मिल सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने Live-in Relationship के बारे में क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग मामलों में लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार किया है। अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि दो सहमति देने वाले वयस्कों का साथ रहना अपने आप में कोई अपराध नहीं है। लेकिन किसी विशेष संबंध को “विवाह की प्रकृति वाला संबंध” मानने के लिए उसके वास्तविक स्वरूप और परिस्थितियों को देखा जाता है।
29 अप्रैल 2009 का महत्वपूर्ण फैसला
Koppisetti Subbharao @ Subramaniam v. State of Andhra Pradesh मामले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ में न्यायमूर्ति डॉ. अरिजीत पसायत और न्यायमूर्ति अशोक कुमार गांगुली शामिल थे। फैसला 29 अप्रैल 2009 को दिया गया था। यह मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 498-A सहित अन्य आरोपों से संबंधित था।
इस निर्णय में अदालत ने यह विचार किया कि वैवाहिक संबंध से जुड़े अपराधों में केवल विवाह की तकनीकी वैधता के आधार पर महिला को कानूनी सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता, यदि मामले के तथ्य कानून की संबंधित धाराओं के अंतर्गत आते हों।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि लिव-इन रिलेशनशिप के लिए आठ विस्तृत मानदंड वाला प्रमुख निर्णय 29 अप्रैल 2009 का मामला नहीं, बल्कि 2013 का Indra Sarma मामला है।
Indra Sarma केस और Live-in Relationship
Indra Sarma v. V.K.V. Sarma मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 26 नवंबर 2013 को लिव-इन रिलेशनशिप और “relationship in the nature of marriage” की कानूनी स्थिति पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। पीठ में न्यायमूर्ति के. एस. राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष शामिल थे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लिव-इन या विवाह जैसी प्रकृति का संबंध अपने आप में अपराध नहीं है और किसी व्यक्ति का विवाह करना या न करना अथवा किसी अन्य वयस्क के साथ संबंध में रहना व्यक्तिगत निर्णय का विषय है।
लेकिन अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हर लिव-इन रिलेशनशिप को “विवाह की प्रकृति वाला संबंध” नहीं माना जा सकता।
Live-in Relationship को “विवाह की प्रकृति वाला संबंध” कब माना जा सकता है?
सुप्रीम कोर्ट ने Indra Sarma मामले में कुछ ऐसे कारकों का उल्लेख किया, जिनकी मदद से यह निर्धारित किया जा सकता है कि कोई संबंध Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005 की धारा 2(f) के तहत “relationship in the nature of marriage” की श्रेणी में आता है या नहीं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ये दिशानिर्देश पूर्ण या अंतिम सूची नहीं हैं और प्रत्येक मामले के तथ्यों को अलग-अलग देखना आवश्यक है।
1. रिश्ते की अवधि
यदि दो लोग लंबे समय तक एक-दूसरे के साथ घरेलू जीवन बिताते हैं, तो रिश्ते की अवधि एक महत्वपूर्ण कारक हो सकती है। हालांकि, केवल लंबे समय तक साथ रहना ही पर्याप्त नहीं है; अन्य परिस्थितियों को भी देखा जाता है।
2. साझा घर में रहना
क्या दोनों व्यक्ति एक ही घर में रहते हैं और क्या उन्होंने वास्तव में साझा घरेलू जीवन स्थापित किया है, यह भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
3. आर्थिक संसाधनों और वित्तीय व्यवस्था का साझा होना
दोनों के बीच आर्थिक सहयोग, बैंक खाते, संपत्ति, निवेश अथवा घरेलू खर्चों को साझा करना संबंध की प्रकृति को समझने में एक कारक हो सकता है।
4. घरेलू जिम्मेदारियां
घर की सफाई, खाना बनाना, घर की देखभाल और अन्य घरेलू जिम्मेदारियों का निर्वहन भी यह समझने में मदद कर सकता है कि संबंध केवल सामान्य परिचय या अस्थायी साथ रहने का है या विवाह जैसी घरेलू व्यवस्था का।
5. यौन संबंध
अदालत ने माना कि विवाह जैसी प्रकृति वाले संबंध में यौन संबंध केवल शारीरिक संबंध तक सीमित नहीं होते, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव, साथ, देखभाल और पारस्परिक जिम्मेदारी जैसे पहलू भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
6. बच्चों का होना और उनका पालन-पोषण
यदि दोनों व्यक्तियों के बच्चे हैं और वे बच्चों के पालन-पोषण तथा जिम्मेदारियों को मिलकर निभाते हैं, तो यह संबंध की प्रकृति निर्धारित करने में एक महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है।
7. समाज में पति-पत्नी के रूप में व्यवहार
यदि दोनों व्यक्ति अपने मित्रों, रिश्तेदारों और समाज के सामने स्वयं को पति-पत्नी की तरह प्रस्तुत करते हैं, तो यह भी संबंध की प्रकृति निर्धारित करने में महत्वपूर्ण परिस्थिति हो सकती है।
8. दोनों पक्षों की मंशा और व्यवहार
संबंध शुरू करते समय दोनों व्यक्तियों की मंशा क्या थी और वे वास्तव में एक-दूसरे के प्रति किस प्रकार की जिम्मेदारियां निभा रहे थे, इसे भी अदालत द्वारा देखा जा सकता है।
क्या हर लिव-इन रिलेशनशिप को विवाह माना जाता है?
नहीं।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों से यह स्पष्ट होता है कि केवल किसी व्यक्ति के साथ लंबे समय तक रहने से वह संबंध स्वतः कानूनी विवाह नहीं बन जाता। अदालत संबंध की पूरी परिस्थितियों को देखकर यह निर्धारित करती है कि वह “विवाह की प्रकृति वाला संबंध” है या नहीं।
D. Velusamy v. D. Patchaiammal (2010) में सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया कि प्रत्येक Live-in Relationship को घरेलू हिंसा कानून के तहत “relationship in the nature of marriage” नहीं माना जा सकता।
महिलाओं को क्या कानूनी सुरक्षा मिल सकती है?
Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005 में “domestic relationship” की अवधारणा के अंतर्गत कुछ ऐसे संबंधों को भी शामिल किया गया है जो “relationship in the nature of marriage” की श्रेणी में आते हैं। इसलिए, उपयुक्त तथ्यों वाले मामले में महिला घरेलू हिंसा कानून के तहत उपलब्ध राहत का दावा कर सकती है।
हालांकि, किसी विशेष मामले में राहत मिलेगी या नहीं, यह उसके तथ्यों, उपलब्ध साक्ष्यों और लागू कानून पर निर्भर करता है।
क्या लिव-इन रिलेशनशिप में महिला भरण-पोषण मांग सकती है?
यह प्रश्न पूरी तरह मामले के तथ्यों और लागू कानून पर निर्भर करता है। सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों में यह स्पष्ट किया गया है कि कानूनी रूप से विवाहित पत्नी की स्थिति और लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला की स्थिति समान नहीं होती।
विशेष परिस्थितियों में, यदि संबंध “विवाह की प्रकृति वाला संबंध” की कानूनी कसौटी पर खरा उतरता है, तो घरेलू हिंसा कानून के तहत उपलब्ध राहतों का प्रश्न उठ सकता है। Indra Sarma मामले में भी इसी प्रकार के कानूनी प्रश्न पर विस्तार से विचार किया गया था।
इसलिए केवल यह कहना सही नहीं होगा कि हर लिव-इन पार्टनर को स्वतः पत्नी के समान भरण-पोषण का अधिकार मिल जाता है।
लिव-इन रिलेशनशिप और कानूनी विवाह में अंतर
| आधार | लिव-इन रिलेशनशिप | कानूनी विवाह |
|---|---|---|
| विवाह समारोह | आवश्यक नहीं | संबंधित कानून के अनुसार आवश्यक हो सकता है |
| वैवाहिक स्थिति | स्वतः पति-पत्नी नहीं बनते | कानूनी विवाह होने पर पति-पत्नी की स्थिति |
| साथ रहना | सामान्यतः सहमति पर आधारित | विवाह के बाद वैवाहिक संबंध |
| कानूनी अधिकार | परिस्थितियों और लागू कानून पर निर्भर | संबंधित विवाह कानूनों के अनुसार अधिकार |
| घरेलू हिंसा कानून | “विवाह की प्रकृति वाले संबंध” होने पर सुरक्षा का प्रश्न उठ सकता है | पति-पत्नी संबंध स्पष्ट रूप से शामिल |
| भरण-पोषण | कानून और परिस्थितियों पर निर्भर | लागू वैवाहिक/अन्य कानूनों के अनुसार |
महत्वपूर्ण बात
लिव-इन रिलेशनशिप के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को केवल इस रूप में समझना उचित नहीं है कि “लिव-इन रिलेशनशिप को विवाह का दर्जा मिल गया है।”
कानूनी स्थिति अधिक सूक्ष्म है। सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग मामलों में यह देखा है कि कुछ लिव-इन संबंधों में विवाह जैसी विशेषताएं हो सकती हैं और ऐसी परिस्थितियों में संबंधित महिला को कानून के तहत सुरक्षा या राहत मिल सकती है। वहीं, प्रत्येक लिव-इन संबंध को स्वतः विवाह की प्रकृति वाला संबंध नहीं माना जाता।
निष्कर्ष
भारत में दो वयस्कों का सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रहना अपने आप में अपराध नहीं है। लेकिन किसी विशेष संबंध की कानूनी स्थिति निर्धारित करते समय अदालत रिश्ते की अवधि, साझा घर, आर्थिक व्यवस्था, घरेलू जिम्मेदारियां, बच्चों की स्थिति, सामाजिक व्यवहार तथा दोनों पक्षों की मंशा और आचरण जैसे कई पहलुओं पर विचार कर सकती है।
इसलिए लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े किसी विवाद में केवल “हम लंबे समय से साथ रह रहे हैं” या “हमने विवाह नहीं किया है” जैसे एक तथ्य के आधार पर कानूनी निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। मामले के पूरे तथ्यों और लागू कानून का परीक्षण आवश्यक होता है।
नोट: यह लेख सामान्य कानूनी जानकारी के उद्देश्य से है। किसी व्यक्तिगत मामले में कानूनी अधिकार, भरण-पोषण, घरेलू हिंसा, संपत्ति या आपराधिक कार्रवाई के संबंध में योग्य अधिवक्ता से सलाह लेना उचित है।


