
जब दो वयस्क व्यक्ति अपने परिवार या समाज की रजामंदी के बिना, कानून के दायरे में रहकर विवाह करना चाहते हैं, तो कोर्ट मैरिज (Court Marriage) सबसे सुरक्षित और कानूनी माध्यम है। भारत में अलग-अलग जाति, धर्म या समुदाय से ताल्लुक रखने वाले जोड़े भी बिना अपने धर्म परिवर्तन किए कोर्ट मैरिज कर सकते हैं।
कोर्ट मैरिज के लिए आवश्यक कानूनी शर्तें
भारत में कोर्ट मैरिज करने के लिए लड़के और लड़की को निम्नलिखित योग्यताओं और शर्तों को पूरा करना अनिवार्य है:
- आयु सीमा: विवाह के समय लड़के की आयु कम से कम 21 वर्ष और लड़की की आयु कम से कम 18 वर्ष होनी चाहिए।
- वैवाहिक स्थिति: विवाह के समय लड़के की कोई जीवित पत्नी और लड़की का कोई जीवित पति नहीं होना चाहिए (यानी वे पहले से विवाहित न हों)। यदि पहले से विवाह हुआ है, तो कानूनी रूप से तलाक या पति/पत्नी की मृत्यु का प्रमाण होना आवश्यक है।
- मानसिक स्थिति: दोनों पक्षों का मानसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ होना आवश्यक है, ताकि वे अपनी सहमति सोच-समझकर दे सकें।
- वैध सहमति: विवाह के लिए दोनों पक्षों की स्वतंत्र और वैध सहमति होनी चाहिए।
कोर्ट मैरिज की पूरी प्रक्रिया (Step-by-Step Guide)
भारत में मुख्य रूप से विशेष विवाह अधिनियम, 1954 (Special Marriage Act) के तहत कोर्ट मैरिज संपन्न कराई जाती है। इसकी प्रक्रिया इस प्रकार है:
1. विवाह अधिकारी को नोटिस देना (Notice of Intended Marriage)
- सबसे पहले, जोड़े को उस जिले के जिला विवाह अधिकारी (Marriage Officer / District Collector) के पास लिखित रूप में नोटिस देना होता है, जहां पिछले कम से कम 30 दिनों से लड़का या लड़की में से कोई एक रह रहा हो।
- इस आवेदन पत्र के साथ निर्धारित शुल्क और दोनों की आयु व पहचान के प्रमाण (जैसे आधार कार्ड, पैन कार्ड, जन्म प्रमाण पत्र) तथा पासपोर्ट साइज फोटो जमा करने होते हैं।
2. नोटिस का प्रकाशन और आपत्ति अवधि (30 Days Notice Period)
- विवाह अधिकारी इस नोटिस को अपने कार्यालय के एक सार्वजनिक और प्रमुख स्थान पर चस्पा (प्रदर्शित) कर देता है।
- यदि लड़का या लड़की में से कोई दूसरे जिले का निवासी है, तो उस जिले के विवाह अधिकारी को भी सूचना भेजी जाती है।
- इस नोटिस का मुख्य उद्देश्य यह जांचना होता है कि विवाह में कोई कानूनी बाधा (जैसे तय उम्र पूरी न होना या पहले से विवाह होना) तो नहीं है।
- इस नोटिस के प्रकाशित होने की तिथि से 30 दिनों की अवधि तक कोई भी व्यक्ति इस विवाह पर वैध कानूनी आपत्ति दर्ज करा सकता है।
3. आपत्तियों का निपटारा (यदि कोई हों)
- यदि 30 दिनों के भीतर कोई वैध आपत्ति नहीं आती है, तो विवाह आगे बढ़ाया जाता है। यदि कोई आपत्ति आती है, तो विवाह अधिकारी उसकी जांच करता है और नियमानुसार निर्णय लेता है।
4. विवाह संपन्न होना और गवाहों की उपस्थिति
- नोटिस की अवधि समाप्त होने के बाद (अर्थात 30 दिन बाद और आवेदन की तारीख से 3 महीने के भीतर), विवाह अधिकारी के समक्ष विवाह संपन्न होता है।
- विवाह के समय कम से कम दो या तीन वयस्क गवाहों का होना अनिवार्य है, जो जोड़े के पहचान पत्र और हस्ताक्षर के साथ उपस्थित रहते हैं।
5. विवाह प्रमाण पत्र जारी करना (Marriage Certificate)
- सभी औपचारिकताएं, गवाहों के हस्ताक्षर और विवाह की प्रक्रिया पूरी होने के बाद, विवाह अधिकारी विशेष विवाह अधिनियम के तहत विवाह प्रमाण पत्र (Marriage Certificate) जारी कर देता है। यह प्रमाण पत्र कानूनी रूप से वैध होता है।
निष्कर्ष
यदि परिवार या समाज अंतर-जातीय या अंतर-धार्मिक विवाह के खिलाफ है, तो भी कानून वयस्क नागरिकों को अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनने का पूरा अधिकार देता है। विशेष विवाह अधिनियम के तहत की गई कोर्ट मैरिज पूरी तरह से वैध, सुरक्षित और सम्मानजनक है। अधिक सटीक और स्थानीय कानूनी प्रक्रियाओं की जानकारी के लिए संबंधित जिले के कलेक्टर कार्यालय या वहां के पारिवारिक मामलों के वकील से संपर्क किया जा सकता है।


